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नीम करोली बाबा और कैंची धाम: आध्यात्मिकता का अद्भुत केंद्र

 नीम करोली बाबा और कैंची धाम: आध्यात्मिकता का अद्भुत केंद्र 

बाबा नीम करौली 

   भारत की पवित्र धरती पर अनेक संत-महात्माओं ने जन्म लिया और अपने अलौकिक ज्ञान से मानवता को दिशा दी। ऐसे ही एक महान संत थे नीम करोली बाबा। उनका नाम सुनते ही भक्तों के मन में श्रद्धा और विश्वास का भाव जागृत हो जाता है। बाबा नीम करोली का जीवन, उनकी शिक्षाएं और उनके आश्रम कैंची धाम के बारे में जानना हर आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है।

नीम करोली बाबा: जीवन परिचय 

  नीम करोली बाबा का असली नाम लक्ष्मण दास शर्मा था। उनका जन्म 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था। उस जमाने में बाल विवाह के चलन के चलते बहुत छोटी उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया। बहुत जल्दी ही बाबा जी का मन समाज व घर गृहस्थी के कामों से उठ गया। उन्होंने सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर साधु जीवन अपना लिया। वह साधु के रूप में पूरे उत्तर भारत में भ्रमण करने लगे। उन्हें अलग अलग जगह पर कई नाम दिए गए जिसमें से हांडी वाला बाबा और तिकोनिया बाबा नाम प्रमुख हैं। भारत में घूमते हुए वह गुजरात पहुंचे,  वहां पर बाबा ने तपस्या की।  17 वर्ष की उम्र में बाबा को ज्ञान की प्राप्ति हुई। वहां पर लोग उन्हें तलाईवा बाबा कहते थे।

  बाबा को उनकी चमत्कारिक शक्तियों और करुणा के लिए जाना जाता था।

क्यों कहते हैं बाबा नीम करौली 

 एक बार बाबा रेल के फर्स्ट क्लास कम्पार्टमेन्ट में सफ़र कर रहे थे। बाबा के पास टिकट नहीं मिलने पर टिकट चेकर ने बाबा को अगले स्टेशन नीब करौली में ट्रेन से उतार दिया। ट्रेन से उतारने के बाद बाबा थोड़ी दूर पर अपना चिमटा धरती में गाढ़कर बैठ गय। जब ट्रेन के चलने का टाईम हुआ तो गार्ड ने ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और इसे चलने का संकेत दिया। लेकिन ट्रेन अपनी जगह से एक इंच भी नहीं चली। बार बार कोशिश करने पर भी ट्रेन अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई तो लोकल मेजिस्ट्रेट जो कि बाबा को जानता था उसने रेलवे स्टेशन पर अधिकारियों को बाबा से माफी मांगने को कहा और बाबा को सम्मान पूर्वक ट्रेन में बिठाने को कहा।   ट्रेन स्टाफ ने बाबा से माफी मांगी और उन्हें सम्मान से ट्रेन में बिठाया। बाबा के ट्रेन में बैठते ही ट्रेन चल पड़ी। तब से लोगों ने उन्हें नीम करौली बाबा कहना शुरू कर दिया।

 कंहा है कैंची धाम:  

कैंची धाम 

  कैंची धाम, जो उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित है, बाबा नीम करोली के प्रमुख आश्रमों में से एक है। यह आश्रम 1962 में बाबा द्वारा स्थापित किया गया था। आश्रम का नाम "कैंची" इसलिए पड़ा क्योंकि यह दो पहाड़ों के बीच कैंची के आकार में स्थित है।
कैंची धाम केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। यहां हर साल लाखों भक्त बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आते हैं। 

क्यों प्रसिद्ध है कैंची धाम:  

 हनुमान जी 

  बाबा नीम करौली एक चमत्कारिक व्यक्ति थे। भक्तजन उन्हें हनुमान जी का अवतार मानते हैं।  उनके संबंध में कई चमत्कारिक किस्से सुनने को मिलते हैं। उनके चमत्कारों के कारण और हनुमान जी की कृपा के कारण ही इस धाम की बहुत प्रसिद्धि है। यह एक ऐसी जगह है जहां से कोई फरयादी खाली हाथ नहीं जाता। यहां बाबा नीम करौली की एक भव्य मूर्ति स्थापित है और यहां एक हनुमान जी की मूर्ति भी है । 

नीम करौली बाबा समाधि स्थल नैनीताल के  पास पंतनगर में है। 

बड़ी -बड़ी हस्तियां हैं भक्तों में शामिल 

    नीम करौली बाबा के भक्तों में एप्पल के मालिक स्टीव जॉब्स, फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग और एक्ट्रेस जूलिया रॉबर्ट्स का नाम शामिल है। कहा जाता है कि इस धाम की यात्रा के बाद उनका जीवन बदल गया। रिचर्ड एलपर्ट (रामदास) ने बाबा के चमत्कारों पर एक किताब लिखी है " मिरेकल आफ लव"। इसी किताब में बुलेट प्रूफ कंबल नाम से एक घटना का जिक्र है। बाबा हमेशा कंबल ओढ़ा करते थे। आज़ भी लोग जब मंदिर जाते हैं तो उन्हें कंबल भेंट करते हैं। 

बाबा की मृत्यु: 

   11 सितंबर 1973 को बाबा की मृत्यु वृंदावन के अस्पताल में हुई।  अंतिम समय में उन्होंने गंगाजल पीकर अपने शरीर का त्याग किया था। 


कैंची धाम की विशेषताएं

  1. शांति और पवित्रता
    कैंची धाम का वातावरण अद्भुत शांति और पवित्रता से भरा हुआ है। हरे-भरे पहाड़ों और कलकल बहती नदियों के बीच स्थित यह स्थान आत्मिक शांति प्रदान करता है।

  2. भक्तों के अनुभव
    बाबा नीम करोली के भक्तों का कहना है कि कैंची धाम में आने से उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान और आत्मिक संतोष प्राप्त होता है। बाबा की दिव्य शक्ति यहां आज भी महसूस की जाती है।

  3. भंडारा और सेवा
    हर साल 15 जून को बाबा के आश्रम में भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें देश- विदेश से लाखों भक्त शामिल होते हैं। नीम करौली बाबा को हनुमानजी का अवतार माना जाता है, हजारों की संख्या में भक्त यहां हनुमानजी का आशीर्वाद लेने आते हैं। यहां सभी के लिए निःशुल्क भोजन और सेवा की व्यवस्था होती है।

नीम करोली बाबा की शिक्षाएं 

बाबा नीम करौली 


  नीम करोली बाबा ने सादा जीवन और उच्च विचार पर जोर दिया। उनकी प्रमुख शिक्षाएं थीं:

  • सेवा का महत्व: उन्होंने मानव सेवा को भगवान की सेवा माना।
  • भक्ति और विश्वास: उन्होंने कहा कि बिना विश्वास के कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  • सादा जीवन: बाबा ने सादगी में ही जीवन का वास्तविक आनंद बताया।

कैंची धाम कैसे पहुंचें? 

  • हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर है, जो कैंची धाम से लगभग 70 किमी दूर है।
  • रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जो यहां से 40 किमी की दूरी पर है।
  • सड़क मार्ग: नैनीताल से कैंची धाम की दूरी लगभग 20 किमी है। यहां तक आप टैक्सी या बस के माध्यम से आसानी से पहुंच सकते हैं।

कैंची धाम का महत्व

  कैंची धाम केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थान है जहां भक्त अपनी आत्मा की शांति और जीवन की दिशा प्राप्त करते हैं। नीम करोली बाबा की कृपा से यह स्थान एक वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र बन गया है।

निष्कर्ष

नीम करोली बाबा और कैंची धाम का अनुभव जीवन को एक नई दिशा और उद्देश्य प्रदान करता है। यहां का हर कोना श्रद्धा और ऊर्जा से परिपूर्ण है। अगर आप भी अपने जीवन में आध्यात्मिक शांति की तलाश में हैं, तो एक बार कैंची धाम जरूर जाएं।

खाटू श्याम जी की आरती (हिन्दी)

खाटू श्याम जी की आरती (हिन्दी)


श्री खाटूश्याम जी 


   ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।

खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे।

ॐ जय श्री श्याम हरे..


   रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर धुरे।

तन केसरिया बागो, कुंडल श्रवण पड़े।

ॐ जय श्री श्याम हरे..


  गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे।

खेवत धूप अग्नि पर दीपक ज्योति जले।

ॐ जय श्री श्याम हरे..

  मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे।

सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे।

ॐ जय श्री श्याम हरे..


  झांझ कटोरा और घडियावल, शंख मृदंग घुरे।

भक्त आरती गावे, जय-जयकार करे।

ॐ जय श्री श्याम हरे..

  जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे।

सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम-श्याम उचेरे।

ॐ जय श्री श्याम हरे.. 

श्री खाटूश्याम जी 


   श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे।

कहत भक्तजन, मनवांछित फल पावे।

ॐ जय श्री श्याम हरे..

जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे।

निज भक्तों के साथ, पुरान काज करे।

ॐ जय श्री श्याम हरे..। 


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"खाटू श्याम जी की कथा: मंदिर, इतिहास, महत्व और दर्शनीय स्थल की पूरी जानकारी"


**खाटू श्याम जी: इतिहास और महिमा**  

बाबा खाटूश्याम जी 


  *भारत के धार्मिक स्थलों की पवित्रता और आध्यात्मिक महत्व को समझने के लिए खाटू श्याम जी का मंदिर एक प्रमुख स्थान है। यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में स्थित है। खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण का कलियुग अवतार माना जाता है। 

  भारत के सबसे पूजनीय देवताओं में से एक खाटू श्याम जी हिंदू भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। जहां खाटू श्याम के चमत्कारों को देखने और उनके दर्शन करने के लिए भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी पर्यटक और श्रद्धालु यहां आते हैं। आज खाटू श्याम के चमत्कार पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि श्याम बाबा से जो भी मांगो वो उसका लाखों गुना देते हैं यही वजह है कि खाटू श्याम जी को लखदातार के नाम से भी जाना जाता है। यही वजह है कि आज देश में करोड़ों भक्त खाटू श्याम जी की पूजा करते हैं। 

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###**खाटूश्याम जी का इतिहास**

  खाटूश्याम जी का इतिहास महाभारत के युद्ध से जुड़ा हुआ है। भारत के सबसे प्रसिद्ध कृष्ण मंदिरों में से एक खाटू श्याम जी का मंदिर मुख्य रूप से महाभारत के भीम के पोते बर्बरीक को समर्पित है। आपको बता दें कि पहले खाटू श्याम जी का नाम बर्बरीक था। वह बलवान गदाधारी भीम के पोते और भीम पुत्र घटोत्कच और नाग राजकुमारी मौरवी के पुत्र थे। वे बचपन से ही वीर और एक निपुण योद्धा थे। उनकी युद्ध कला महारत में उनकी माता का बहुत बड़ा योगदान था। 

###**भगवान शिव से प्राप्त किए तीन बाण **

 उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या कर तीन बाण प्राप्त किए थे। ये तीन बाण उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने के लिए पर्याप्त थे। इसी बीच  कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध का ऐलान हुआ तो उन्होंने भी युद्ध में शामिल होने की इच्छा जताई। तब उनकी मां के कहने पर बर्बरीक ने अपनी मां को वचन दिया कि जो भी पक्ष युद्ध में हार रहा होगा वह उसकी तरफ से युद्ध लड़ेगा। 

  ###**श्री कृष्ण जी ने ली बर्बरीक की परीक्षा** 

श्री खाटूश्याम जी 


   जब श्री कृष्ण जी को बर्बरीक की इस प्रतिज्ञा के बारे में पता चला तो वह बर्बरीक से मिलने पहुंचे । तब बर्बरीक ने कहा कि उसका एक बाण ही शत्रु सेना को मार गिराने के लिए पर्याप्त है, ऐसे में यदि वह तीन बाण मार देगा तो ब्रह्मांड नष्ट हो जाएगा। यह जानकर भगवान कृष्ण ने बर्बरीक को पीपल के बृक्ष के सभी पत्तों को छेदने की चुनौती दी। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार कर ली। उसकी परीक्षा लेने के लिए श्री कृष्ण ने उसके पैरों के नीचे एक पत्ता दबा दिया। बर्बरीक ने बाण चलाया तो पीपल के सभी पत्तों में छेद करने के बाद बाण श्री कृष्ण के पैरों के पास चक्कर लगाने लगा। बर्बरीक ने  श्री कृष्ण से कहा कि आपके पैरों के नीचे एक पत्ता दबा है, और उनसे पैर हटाने का आग्रह किया । जब श्री कृष्ण जी ने पत्ते के उपर से पैर हटाया तो तीर पत्ते को छेदकर बर्बरीक के पास वापिस आ गया।  उसके बाद श्री कृष्ण ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए। 

###**बर्बरीक का बलिदान**

 श्री कृष्ण बर्बरीक की शक्ति और वचन से भलीभांति परिचित थे। उन्हें पता था कि अगर बर्बरीक युद्ध में भाग लेगा तो दोनों सेनाओं का विनाश हो जाएगा। 

 भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक को युद्ध से बाहर रखने के बारे में विचार किया।  श्री कृष्ण जी ने उनका बलिदान मांगा ताकि युद्ध धर्म और न्याय के अनुसार हो सके। बर्बरीक अपना बलिदान देने के लिए तैयार हो गए। बर्बरीक ने उनसे अपनी अंतिम इच्छा जताई। उसने कहा कि वह महाभारत युद्ध को अंत तक अपनी आंखों से देखना चाहता है। श्री कृष्ण ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली । बर्बरीक ने अपना शीश काटकर श्री कृष्ण जी को दे दिया और बर्बरीक का सिर युद्ध भूमि में एक पहाड़ी के ऊपर रख दिया, जहां से बर्बरीक ने महाभारत युद्ध को अंत तक अपनी आंखों से देखा। बर्बरीक के इस बलिदान से प्रसन्न होकर भगवान ने बर्बरीक को वरदान दिया कि कलयुग में उनकी पूजा "श्याम" के नाम से होगी। महाभारत के युद्ध के बाद जहां पर उनका शीश दफनाया गया वह स्थान खाटूश्याम कहलाया। 

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###**खाटूश्याम मंदिर का निर्माण ** 

श्री खाटूश्याम मंदिर 


 एक बार एक गांव में इस स्थान पर एक गाय के स्तनों से दूध अपने आप गिर रहा था जब लोगों ने यह देखा तो हैरान रह गए। जब ​​इस स्थान की खुदाई की गई तो बर्बरीक का कटा हुआ सिर मिला। यह सिर एक ब्राह्मण को सौंप दिया गया। वह इसकी रोजाना पूजा करने लगा। एक दिन खाटू नगर के राजा रूप सिंह को सपने में मंदिर बनवाने और बर्बरीक का सिर मंदिर में स्थापित करने के लिए कहा गया। 

   जयपुर के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध खाटू श्याम जी मंदिर का निर्माण 1027 में खाटू गांव के शासक राजा रूप सिंह चौहान और उनकी पत्नी ने करवाया था। किवदंती के अनुसार एक बार राजा रूप सिंह को स्वप्न आया जिसमें खाटू के तालाब में श्याम का सिर मिलने पर उनसे मंदिर बनवाने को कहा गया। तब राजा रूप सिंह ने खाटू गांव में खाटू श्याम जी के नाम से मंदिर बनवाया इसका पुनर्निर्माण प्रसिद्ध दीवान अभय सिंह ने 1720 में करवाया था।


#### **मंदिर की स्थापत्य कला**  

खाटूश्याम मंदिर गेट 


   मंदिर का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है, जो इसकी सुंदरता को और बढ़ाता है। मंदिर का मुख्य द्वार और गर्भगृह की नक्काशी अत्यंत आकर्षक है। यहां भगवान श्याम की मूर्ति के दर्शन मात्र से मन को शांति और भक्ति का अनुभव होता है।  

    खाटू श्याम जी के मंदिर के पास एक पवित्र कुंड है जिसका नाम श्याम कुंड है। ऐसा माना जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से मनुष्य के सभी रोग दूर हो जाते हैं और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है, इसीलिए हर साल लाखों श्रद्धालु इस पवित्र कुंड में स्नान करते हैं, खासकर वार्षिक फाल्गुन मेले के दौरान, यहां डुबकी लगाना बहुत पवित्र माना जाता है। 

श्याम कुंड

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### **खाटू श्याम जी मंदिर का महत्व**  

    खाटू श्याम जी का मंदिर एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। मंदिर में भगवान श्याम का दिव्य शीश प्रतिष्ठित है। यह माना जाता है कि इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। यहां हर साल फाल्गुन महीने में भव्य मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।  

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### **खाटू श्याम जी की महिमा** 

1. **कलियुग के भगवान**: खाटू श्याम जी को कलियुग के भगवान के रूप में पूजा जाता है।  

2. **श्रद्धालुओं का विश्वास**: भक्तजन यहां अपने दुखों का निवारण और इच्छाओं की पूर्ति के लिए आते हैं।  

3. **भजन और कीर्तन**: खाटू श्याम जी के भजन और कीर्तन उनके भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं।  

### **कैसे पहुंचे खाटू श्याम जी?**  

- **रेल मार्ग**: खाटू श्याम जी का नजदीकी रेलवे स्टेशन रींगस है, जो देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।  

- **सड़क मार्ग**: खाटू गांव राजस्थान के मुख्य शहरों से अच्छी सड़क मार्ग से जुड़ा है।  

- **हवाई मार्ग**: जयपुर हवाई अड्डा यहां का निकटतम हवाई अड्डा है।  

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### **निष्कर्ष**  

    खाटू श्याम जी का मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और इतिहास का प्रतीक भी है। यहां आने से आत्मा को शांति और भगवान के प्रति असीम श्रद्धा का अनुभव होता है। यदि आप आध्यात्मिक यात्रा पर जाना चाहते हैं, तो खाटू श्याम जी का दर्शन अवश्य करें।  


*जय श्री श्याम!*


महा कुंभ मेला 2025 कब और कहां आयोजित किया जाएगा, Kumbh Mela 2025

## महा कुंभ मेला 2025: प्रयागराज में विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक त्यौहार



Kumbh Mela 


   आज हम आपको एक ऐसे त्यौहार के बारे में बताने जा रहे हैं जो विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक त्यौहार है - महा कुंभ मेला। महाकुंभ मेला हिंदुओं का ऐसा पर्व है जिसे विश्व के सबसे बड़े आयोजनों में से एक माना जाता है। 

 ### महा कुंभ मेला क्या है?

 महा कुंभ मेला एक हिंदू त्यौहार है जो गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर आयोजित होता है। यह मेला चार स्थानों पर आयोजित होता है - प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। प्रयागराज में आयोजित होने वाला महा कुंभ मेला सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

## कब और कहां आयोजित किया जाएगा महाकुंभ:- 



    2025 में, यह मेला प्रयागराज के त्रिवेणी में गंगा, यमुना, और सरस्वती नदी के संगम पर 13 फरवरी से आयोजित होने जा रहा है। यह मेला हर 12 वर्षों में एक बार आयोजित होता है और इसमें करोड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं। 

## क्यों मनाया जाता है कुंभ मेला:- 

  मान्यता है कि देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, जिससे अमृत कलश प्राप्त हुआ था। अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में युद्ध शुरू हो गया इस युद्ध के दौरान अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी के चार स्थानों पर गिरीं । यह स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक हैं। तब से यह स्थान पवित्र माने जाते हैं, यही कारण है कि इन स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

    मान्यता है कि कुंभ मेले में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है और अंत में व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

###क्यों 12 साल में एक बार लगता है महाकुंभ:- 

  मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों के बीच 12 दिनों तक युद्ध हुआ था और देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है इस खगोलीय घटना की वजह से महाकुंभ का आयोजन 12 साल बाद किया जाता है। 

  युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र  और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र, सूर्य आदि ग्रह जब आते हैं तब कुंभ मेले का योग बनता है। 

   चार पवित्र स्थानों पर प्रत्येक 3 वर्ष के अंतराल पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है, इस तरह से हर 12 साल बाद प्रत्येक स्थान पर महाकुंभ मेले का आयोजन होता है।


### महा कुंभ मेला 2025 की तारीखें 


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###महा कुंभ मेला 2025 की तारीखें निम्नलिखित हैं: 

-** पौष पूर्णिमा (पहला शाही स्नान)**: 13 जनवरी,

- **मकर संक्रांति (दूसरा शाही स्नान)**: 14 जनवरी, 2025

- **मौनी अमावस्या (तीसरा शाही स्नान)**: 29 जनवरी, 2025

- **बसंत पंचमी (चौथा शाही स्नान)**: 3 फरवरी, 2025 

-**माघी पूर्णिमा (पांचवां शाही स्नान)**: 12 फरवरी, 2025 

-** महाशिवरात्रि ( छठा शाही स्नान) -**: 26 फरवरी।

### महा कुंभ मेला की महत्ता

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  महा कुंभ मेला की महत्ता काफी है। यहां पर लोग अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए स्नान करते हैं। इस मेले में साधु-संत, नागा साधु और अन्य धार्मिक गुरुओं का भी समागम होता है। यहां पर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम, सत्संग, भजन-कीर्तन और प्रवचन भी आयोजित होते हैं। 

## कंहा आयोजित किया जाएगा अगला महाकुंभ :- 


kumbh mela
                    

    अगला कुंभ मेला 2028 में 27 मार्च से 27 मेई तक उज्जैन आयोजित किया जाएगा । इस महापर्व में 9 अप्रैल से 8 मेई तक 3 शाही स्नान व 7 पर्व स्थान प्रस्तावित हैं।

 उज्जैन में यह मेला शिप्रा नदी के तट पर आयोजित किया जाता है 

### महा कुंभ मेला में भाग लेने के लिए टिप्स

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1. **यात्रा की योजना**: महा कुंभ मेला में भाग लेने के लिए पहले से ही यात्रा की योजना बना लें। ट्रेन, बस और फ्लाइट की टिकट पहले से बुक कर लें।

2. **रहने की व्यवस्था**: प्रयागराज में रहने की व्यवस्था पहले से ही कर लें। होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाओं में पहले से ही बुकिंग कर लें।

3. **स्वास्थ्य और सुरक्षा**: मेले में भाग लेने के लिए अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखें। साफ-सुथरे पानी का उपयोग करें और भीड़ में सावधान रहें।

### निष्कर्ष

महा कुंभ मेला 2025 एक ऐसा अवसर है जो आपको धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से बहुत कुछ देगा। यदि आप इस मेले में भाग लेना चाहते हैं, तो पहले से ही तैयारी कर लें और इस अनूठे अनुभव का आनंद लें। 



राम मंदिर का इतिहास, Ram Mandir, राम मंदिर का निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा history of Ram mandir ayodhya

 श्री राम मंदिर अयोध्या 


Ram Mandir Ayodhya

  राम मंदिर का इतिहास 

राम मंदिर हिंदुओं का पवित्र धार्मिक स्थल है। राम मंदिर उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित है।
  माना जाता है कि भगवान राम का जन्म इस स्थान पर हुआ था। माना जाता है कि भगवान राम के समाधि लेने के बाद भगवान राम के पुत्र कुश ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।  उसके बाद ईसा के 100 बर्ष पूर्व उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने 84 सतम्भों पर विशाल मंदिर का पुनः निर्माण करवाया था। 
ऐसा कहा जाता है कि ईसा की 11 वीं शताब्दी में कन्नौज के नरेश जयचंद ने मंदिर पर सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति शिलालेख की जगह अपना नाम दर्ज कर दिया।

 विवाद की शुरुआत 


    7 वीं सदी के बाद मुग़ल आक्रांताओं के आक्रमण भारत पर बढ़ गय, आक्रमणकारियों द्वारा काशी, मथुरा, अयोध्या आदि मंदिरों में लूटपाट करने और पुजारियों को मारने का क्रम जारी रहा। 

   लेकिन 14 वीं शताब्दी तक राम मंदिर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए। क्योंकि आसपास के राजा और हजारों साधुओं ने मंदिर को बचाने का काम किया और अपने प्राणों का बलिदान दिया। 

 आखिरकार वर्ष 1528 में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने मंदिर गिराया और मंदिर की जगह बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। 
 इसे लेकर हिंदू समुदाय ने दावा किया कि यह जगह भगवान राम की जन्मभूमि है और यहां एक प्राचीन मंदिर था। हिंदू पक्ष के मुताबिक मुख्य गुंबद के नीचे ही भगवान राम का जन्मस्थान था।

राम मंदिर के लिए कानूनी जंग

  1853 में इस जगह के आसपास पहली बार दंगे हुए। 1859 में अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी। मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दी गई। 
   साल 1950में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई। इसमें एक में रामलला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई। 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की। 
  वर्ष 1961 में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित स्थल पर कब्जे और मूर्तियों को हटाने की मांग को लेकर याचिका दायर की। 
वर्ष 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने विवादित ढांचे के स्थल पर मंदिर निर्माण के लिए एक समिति का गठन किया। 
 वर्ष 1986 में यूसी पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला न्यायाधीश केएम पांडे ने 1 फरवरी 1986 को ढांचे से ताला हटाने का आदेश दिया, जिससे हिंदुओं को पूजा करने की अनुमति मिल गई। 

बाबरी मस्ज़िद का ढांचा गिराया 

         
        

Babari Masjid
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  6 दिसंबर 1992 को वीएचपी और शिवसेना समेत अन्य हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को गिरा दिया था। देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, जिसमें 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।

  साल 2002 में गोधरा में हिंदू समाज को ले जा रही ट्रेन में आग लग गई थी, जिसमें 58 लोगों की मौत हो गई थी। इसके चलते गुजरात में भड़के दंगों में 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।

  साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला मंदिर और निर्मोही क्षेत्र के बीच 3 समता-बारबरा विचारधारा वाले अलास्का स्थल पर आग लगाने का आदेश दिया था।

  साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अयोध्या विवाद पर आए फैसले पर रोक लगा दी थी।

कोर्ट से बाहर मामले को सुलझाने की कोशिश:-


2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट से बाहर मामले को सुलझाने की बात कही। शीर्ष भाजपा नेताओं पर फिर से आपराधिक साजिश के आरोप लगे।

8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। पैनल को 8 सप्ताह के भीतर कार्यवाही पूरी करने को कहा गया।

2 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले को सुलझाने में विफल रहा।

राम मंदिर के पक्ष में फैसला 


9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। विवादित जमीन में से 2.77 एकड़ जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया।

राम मंदिर निर्माण और भूमि पूजन कार्यक्रम:

Ram Lalla in Ram Mandir 

  सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर का निर्माण जोरों पर शुरू हो गया है। निर्माणाधीन मंदिर के गर्भगृह और भूतल का काम पूरा हो चुका है। राम मंदिर का भूमि पूजन कार्यक्रम 5 अगस्त 2020 को संपन्न हुआ। राम मंदिर के गर्भगृह में श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम 22 जनवरी 2024 को संपन्न हुआ। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य यजमान के रूप में उपस्थित रहे। समारोह में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संतों समेत कई लोगों को आमंत्रित किया गया था। अयोध्या पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी सबसे पहले हनुमानगढ़ी के दर्शन करने गए। उन्होंने रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। 

         

 राम मंदिर का निर्माण कार्य साल 2025 के मध्य तक पूरा होने की संभावना है।

 

कैसे पहुंचें राम मंदिर अयोध्या  

1. हवाई मार्ग से

अगर आप हवाई मार्ग से यात्रा करना चाहते हैं, तो अयोध्या के सबसे नजदीकी हवाई अड्डा अयोध्या एयरपोर्ट (मंगल भवन हवाई अड्डा) है, जो मुख्य शहर से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा, लखनऊ का चौधरी चरण सिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (140 किलोमीटर दूर) भी एक विकल्प है। वहां से आप टैक्सी या बस द्वारा अयोध्या पहुंच सकते हैं।

2. रेल मार्ग से

अयोध्या रेलवे स्टेशन (AY) देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज और दिल्ली से नियमित ट्रेन सेवाएं उपलब्ध हैं। अयोध्या रेलवे स्टेशन से राम मंदिर की दूरी लगभग 2-3 किलोमीटर है, जिसे आप ऑटो-रिक्शा, टैक्सी या पैदल तय कर सकते हैं।

3. सड़क मार्ग से

अयोध्या उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों और राज्यों से सड़क मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 27 और NH 19) से अयोध्या तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • लखनऊ (135 किलोमीटर), वाराणसी (200 किलोमीटर), और गोरखपुर (125 किलोमीटर) से बस या निजी वाहन द्वारा यात्रा की जा सकती है।
  • राज्य परिवहन की बसें भी नियमित रूप से उपलब्ध हैं।

4. स्थानीय परिवहन

अयोध्या शहर के भीतर रिक्शा, ऑटो, और स्थानीय बसें आसानी से उपलब्ध हैं। राम मंदिर तक पहुंचने के लिए आप इनका उपयोग कर सकते हैं।

सुझाव

  1. मंदिर दर्शन के लिए सुबह जल्दी पहुंचे, ताकि भीड़ से बचा जा सके।
  2. अपने साथ पहचान पत्र और जरूरी सामान रखें।
  3. अयोध्या में अन्य धार्मिक स्थलों जैसे कनक भवन, हनुमानगढ़ी और सरयू नदी घाट का भी दर्शन कर सकते हैं।

राम मंदिर पहुंचने के लिए हर साधन सुगम और सुविधाजनक है। यह यात्रा आपके लिए आध्यात्मिक और यादगार अनुभव होगी।

       

       Jai Shree Ram 



अक्षरधाम मंदिर का इतिहास, History of Akshardham temple

अक्षरधाम मंदिर का इतिहास



 भारत की राजधानी दिल्ली में यमुना नदी के किनारे बना यह मंदिर विश्व का लगभग 100 एकड़ भूमि पर हिंदू तीर्थस्थल है। आइये जानते हैं इस मनमोहक और विशाल मंदिर की कुछ बातें -

 अक्षरधाम या स्वामी नारायण अक्षरधाम मंदिर एक हिंदू मंदिर है। यह एक अनोखा सांस्कृतिक तीर्थ स्थल है। यह मंदिर ज्योतिर्धर भगवान स्वामीनारायण की पुण्य स्मृति में बनाया गया है। इस मंदिर को स्वामी नारायण अक्षरधाम के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में लाखो हिन्दू साहित्यों और संस्कृतियों और कलाकृतियों को मनमोहक अंदाज़ में दर्शाया गया है।
अक्षरधाम मंदिर 

अक्षरधाम मंदिर का निर्माण  

     स्वामीनारायण अक्षरधाम परिसर का मुख्य आकर्षण अक्षरधाम मंदिर है। यह मंदिर 86342 वर्ग फीट क्षेत्र में फैला हुआ है। यह 141 फीट ऊंचा, 316 फीट चौड़ा और 356 फीट लंबा है। मंदिर में 2870 सीढ़ियाँ और एक तालाब है जो भारत के महान गणितज्ञों की महानता को दर्शाता है।

   मंदिर का निर्माण श्री अक्षरधाम पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख महाराज के नेतृत्व में किया गया है। मंदिर के निर्माण में गुलाबी पत्थर, सफेद संगमरमर और बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसका निर्माण हिंदू शिल्प शास्त्र के अनुसार किया गया है और मुख्य मंदिर में स्टील का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

   लगभग 11000 कलाकारों और अनगिनत सहयोगियों ने मिलकर इस विशाल मंदिर का निर्माण किया, इस मंदिर की स्थापना नवंबर 2005 में की गई थी। 


    मंदिर को पाँच प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है। इस मंदिर में 234 नक्काशीदार खंभे, 9 सुसज्जित गुंबद, 20 शिखर और 20000 साधुओं, अनुयायियों और आचार्यों की मूर्तियाँ हैं। स्वामीनारायण मंदिर जाति गुरुओं की मूर्तियों से घिरा हुआ है। स्वामीनारायण में बनी हर मूर्ति हिंदू परंपरा के अनुसार पंच धातु से बनी है। इस मंदिर में सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की मूर्तियाँ भी हैं। अक्षरधाम मंदिर गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल है। अक्षरधाम मंदिर को दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर माना जाता है।
AksharDham Mandir


अक्षरधाम मंदिर के मुख्य आकर्षण-


1. नारायण सरोवर- अक्षरधाम मंदिर का मुख्य भवन एक झील से घिरा हुआ है जिसे नारायण सरोवर कहा जाता है। झील के पास 108 गौमुख भी बने हुए हैं और ऐसा माना जाता है कि ये 108 गौमुख 108 हिंदू देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।


2. म्यूजिकल फाउंटेन- इस खूबसूरत और मनमोहक मंदिर में एक आकर्षक म्यूजिकल फाउंटेन शो भी है। यह शो हर शाम आयोजित किया जाता है। इस शो में जीवन चक्र भी दिखाया जाता है, जो मनुष्य के जन्म से शुरू होकर मृत्यु पर समाप्त होता है, इसे दिखाते समय म्यूजिकल फाउंटेन का इस्तेमाल किया जाता है।

3. गार्डन ऑफ इंडिया- अक्षरधाम मंदिर में एक और आकर्षक उद्यान है। पीतल की मूर्तियों से सजे उद्यान में कमल के फूल और घास के मैदान इस पूरे परिसर को आकर्षक बनाते हैं। यह उद्यान पवित्रता का एक रूप है।

4. विशाल मूवी स्क्रीन- मंदिर में एक मूवी स्क्रीन भी लगाई गई है। जिसमें बच्चों को योगी नीलकंठ बरनी पर आधारित फिल्म और छह से अधिक कहानियों पर आधारित फिल्में दिखाई जाती हैं।

5. फाउंटेन शो- यहां हर शाम फाउंटेन शो का आयोजन किया जाता है। इस शो में जन्म-मृत्यु के चक्र को दिखाया जाता है।

कैसे पहुंचें अक्षरधाम मंदिर 


1. मेट्रो द्वारा:

दिल्ली मेट्रो अक्षरधाम मंदिर तक पहुँचने का सबसे आसान और सुविधाजनक साधन है।

  • निकटतम मेट्रो स्टेशन: अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन (ब्लू लाइन पर)।
  • मेट्रो स्टेशन से मंदिर तक आप पैदल या ऑटो रिक्शा से पहुँच सकते हैं। यह दूरी लगभग 5-10 मिनट की है।

2. बस द्वारा:

दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की बसें अक्षरधाम मंदिर के पास से गुजरती हैं।

  • आप दिल्ली के विभिन्न स्थानों से अक्षरधाम के लिए सीधी बसें ले सकते हैं।
  • पास का बस स्टॉप: अक्षरधाम बस स्टॉप।

3. टैक्सी या कैब द्वारा:

अगर आप निजी वाहन या टैक्सी से यात्रा कर रहे हैं, तो गूगल मैप्स का उपयोग करके अक्षरधाम मंदिर का मार्ग आसानी से पा सकते हैं।

  • मंदिर का पता: अक्षरधाम सेतु, नोएडा मोड़, दिल्ली।
  • यहां के लिए ऐप आधारित कैब सेवाएं जैसे ओला, उबर भी उपलब्ध हैं।

4. निजी वाहन द्वारा: 



यह भी पढ़ें: जाने रहस्यों से भरे कोणार्क सूर्य मंदिर के बारे मैं 

अगर आप अपनी गाड़ी से आ रहे हैं, तो अक्षरधाम मंदिर के पास पर्याप्त पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है।

  • नोएडा लिंक रोड पर स्थित मंदिर तक दिल्ली और नोएडा से सीधा मार्ग है।

यात्रा के समय का ध्यान रखें:

  • मंदिर सोमवार को बंद रहता है।
  • समय: सुबह 10:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक (संपूर्ण जानकारी के लिए आधिकारिक वेबसाइट देखें)।
  • भीड़ से बचने के लिए सुबह या शाम का समय चुनें।

अतिरिक्त सुझाव:

  • मंदिर के अंदर कैमरा, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान ले जाने की अनुमति नहीं है।
  • आरामदायक कपड़े पहनें और धार्मिक स्थल की मर्यादा का ध्यान रखें।

यह मंदिर अपनी भव्यता, अद्भुत शिल्पकला और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की यात्रा आपको आध्यात्मिक अनुभव से भर देगी।

कोणार्क सूर्य मंदिर की कहानी, इतिहास


कोणार्क सूर्य मंदिर 

  कोणार्क सूर्य मंदिर, ओडिशा राज्य के पुरी जिले में स्थित है और यह भारत के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों में से एक है। इसे "ब्लैक पगोडा" के नाम से भी जाना जाता है। यहां तक पहुंचने के लिए आप विभिन्न तरीकों का उपयोग कर सकते हैं।

कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण 


   कोणार्क सूर्य मंदिर 13 वी शताब्दी का सूर्य मंदिर है जो भारत के ओडिशा राज्य के कोणार्क में स्थित है। ऐसा माना जाता है की यह मंदिर पूर्वी गंगा साम्राज्य के महाराजा नरसिंहदेव 1 ने 1250 CE में बनवाया था।  यह मंदिर बहुत बडे रथ के आकार में बना हुआ है, जिसमे कीमती धातुओ के पहिये, पिल्लर और दीवारे बनी है। मंदिर का मुख्य भाग आज विनाश की कगार पर है. आज यह मंदिर UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साईट में भी शामिल है और साथ ही यह मंदिर भारत के 7 आश्चर्यो में भी शामिल है।

कोणार्क सूर्य मंदिर

कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास-



  भविष्य पुराण और साम्बा पुराण के अनुसार उस क्षेत्र में इस मंदिर के अलावा एक और सूर्य मंदिर था, जिसे 9 वी शताब्दी या उससे भी पहले देखा गया था। इन किताबो में मुंडीरा (कोणार्क), कलाप्रिय (मथुरा) और मुल्तान में भी सूर्य मंदिर बताये गए है.


   धर्मग्रन्थ साम्बा के अनुसार, कृष्णा के बेटे को कुष्ट रोग का श्राप था। उन्हें ऋषि कटक ने इस श्राप से बचने के लिये सूरज भगवान की पूजा करने की सलाह दी। तभी साम्बा ने चंद्रभागा नदी के तट पर मित्रवन के नजदीक 12 सालो तक कड़ी तपस्या की। दोनों ही वास्तविक कोणार्क मंदिर और मुल्तान मंदिर साम्बा की ही विशेषता दर्शाते है।
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   एरीथ्रैअन सागर (पहली सदी CE) के पास एक बंदरगाह भी था जिसे कैनपरा कहा जाता था, और उसी को आज कोणार्क कहा जाता है।

    कोणार्क नाम विशेषतः कोना- किनारा और अर्क – सूर्य शब्द से बना है। यह पूरी और चक्रक्षेत्र के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर बसा हुआ है।


कोणार्क मंदिर वास्तु-कला –

कोणार्क सूर्य मंदिर


    वैसे यह मंदिर असल में चंद्रभागा नदी के मुख में बनाया गया है लेकिन अब इसकी जलरेखा दिन ब दिन कम होती जा रही है। यह मंदिर विशेषतः सूरज भगवान के रथ के आकार में बनाया गया है। सुपरिष्कृत रूप से इस रथ में धातुओ से बने चक्कों की 12 जोड़िया है जो 3 मीटर चौड़ी है और जिसके सामने कुल 7 घोड़े (4 दाई तरफ और 3 बायीं तरह) है। इस मंदिर की रचना भी पारंपरिक कलिंगा प्रणाली के अनुसार ही की गयी है और इस मंदिर को पूर्व दिशा की ओर इस तरह बनाया गया है की सूरज की पहली किरण सीधे मंदिर के प्रवेश पर ही गिरे। खोंदालिट पत्थरो से ही इस मंदिर का निर्माण किया गया था। 

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   वास्तविक रूप से यह मंदिर एक पवित्र स्थान है, जो 229 फ़ीट  ऊँचा है। इतना ऊँचा होने की वजह से और 1837 में वहाँ विमान गिर जाने की वजह से मंदिर को थोड़ी बहुत क्षति भी पहुची थी।


   वर्तमान में इस मंदिर में और भी कई हॉल है जिसमे मुख्य रूप से नाट्य मंदिर और भोग मंडप शामिल है।

   कोणार्क मंदिर अपनी कामोत्तेजक मूर्तिवश मैथुन के लिये भी जाना जाता है।

   इस मंदिर के आस-पास 2 और विशाल मंदिर पाये गए है. जिसमे से एक महादेवी मंदिर जो कोणार्क मंदिर के प्रवेश द्वार के दक्षिण में है। ऐसा माना जाता है की महादेवी मंदिर सूरज भगवान की पत्नी का मंदिर है। इस मंदिर को 11 वी शताब्दी के अंत में खोजा गया था। कोणार्क मंदिर के पास का दूसरा मंदिर वैष्णव समुदाय का है। जिसमे बलराम, वराह और त्रिविक्रम की मुर्तिया स्थापित की गयी है, इसीलिये इसे वैष्णव मंदिर भी कहा जाता है। लेकिन दोनों ही मंदिर की मुलभुत मुर्तिया गायब है।

    मंदिरो से गायब हुई बहोत सी मूर्तियो को कोणार्क आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम में देखा गया था।


सन डायल & टाइम –



   मंदिर के पहिये धूपघड़ी का काम करते है जिसकी सहायता से हम दिन-रात दोनों ही समय सही समय का पता लगा सकते है।

कोणार्क मंदिर 2


 कोणार्क मंदिर की कुछ अन्य रोचक बातें  – 



1. रथ के आकार का निर्माणकार्य-


   कोणार्क मंदिर का निर्माण रथ के आकार में किया गया है जिसके कुल 24 पहिये है.

   रथ के एक पहिये का डायमीटर 10 फ़ीट का है और रथ पर 7 घोड़े भी है.


2. यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट


   आश्चर्यचकित प्राचीन निर्माण कला का अद्भुत कोणार्क मंदिर यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट में शामिल है. ये सम्मान पाने वाला ओडिशा राज्य का वह अकेला मंदिर है.


3. नश्वरता की शिक्षा –


   कोणार्क मंदिर के प्रवेश भाग पर ही दो बड़े शेर बनाये गए है. जिसमे हर एक शेर को हाथी का विनाश करते हुए बताया गया है. और इंसानी शरीर के अंदर भी एक हाथी ही होता है.

   उस दृश्य में शेर गर्व का और हाथी पैसो का प्रतिनिधित्व कर रहे है.

  इंसानो की बहुत सी समस्याओं को उस एक दृअह्य में ही बताया गया है.


4. सूर्य भगवान को समर्पित –


  मंदिर में सूर्य भगवान की पूजा की जाती है।

   मंदिर का आकार एक विशाल रथ की तरह है और यह मंदिर अपनी विशेष कलाकृति और मंदिर निर्माण में हुए कीमती धातुओ के उपयोग के लिये जाना जाता है।


5. मंदिर के रथ के पहिये धुपघडी का काम करते है और सही समय बताते है 


  इस मंदिर का मुख्य आकर्षन रथ में बने 12 पहियो की जोड़ी है. ये पहिये को साधारण पहिये नही है क्योकि ये पहिये हमें सही समय बताते है, उन पहियो को धूपघड़ी भी कहा गया है।

   कोई भी इंसान पहियो की परछाई से ही सही समय का अंदाज़ा लगा सकता है।


6. निर्माण के पीछे का विज्ञान 


   मंदिर में ऊपरी भाग में एक भारी चुंबक लगाया गया है और मंदिर के हर दो पत्थरो पर लोहे की प्लेट भी लगी है. चुंबक को इस कदर मंदिर में लगाया गया है की वे हवा में ही फिरते रहते है।

   इस तरह का निर्माणकार्य भी लोगो के आकर्षण का मुख्य कारण है, लोग बड़ी दूर से यह देखने आते है।


7. काला पगोडा –


   कोणार्क मंदिर को पहले समुद्र के किनारे बनाया गया था लेकिन समंदर धीरे-धीरे कम होता गया और मंदिर भी समंदर के किनारे से थोडा दूर हो गया और मंदिर के गहरे रंग के लिये इसे काला पगोडा कहा जाता है और नकारात्मक ऊर्जा को कम करने के लिये ओडिशा में इसका प्रयोग किया जाता है।


8. वसृशिल्पीय आश्चर्य-


   कोणार्क मंदिर का हर एक टुकड़ा अपने आप में ही विशेष है और लोगो को आकर्षित करता है।

इसीलिये कोणार्क सूर्य मंदिर भारत के सात आश्चर्यो में से एक है।


9. किनारो पर किया गया निर्देशन-


   हर दिन सुबह सूरज की पहली किरण नाट्य मंदिर से होकर मंदिर के मध्य भाग पर आती है। उपनिवेश के समय ब्रिटिशो ने चुम्बकीय धातु हासिल करने के लिये चुंबक निकाल दिया था।

कैसे पहुंचें कोणार्क सूर्य मंदिर 

1. हवाई मार्ग से

कोणार्क के सबसे नजदीकी हवाई अड्डा भुवनेश्वर है, जो लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

  • भुवनेश्वर हवाई अड्डा भारत के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
  • हवाई अड्डे से आप टैक्सी, कैब या बस द्वारा कोणार्क पहुंच सकते हैं।

2. रेल मार्ग से

कोणार्क के पास कोई रेलवे स्टेशन नहीं है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पुरी है, जो लगभग 35 किलोमीटर दूर है।

  • पुरी रेलवे स्टेशन भारत के बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।
  • स्टेशन से आप टैक्सी या लोकल बस लेकर मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

3. सड़क मार्ग से

सड़क मार्ग से कोणार्क पहुंचना बहुत आसान है।

  • भुवनेश्वर और पुरी से नियमित रूप से बस सेवाएं उपलब्ध हैं।
  • आप अपनी कार, टैक्सी या बाइक से भी यहां पहुंच सकते हैं।
  • भुवनेश्वर से कोणार्क के बीच की सड़क "पुरी-कोणार्क मरीन ड्राइव" प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है।

4. स्थानीय परिवहन

  • कोणार्क पहुंचने के बाद मंदिर तक जाने के लिए ऑटो रिक्शा या पैदल चलना आसान होता है।
  • स्थानीय गाइड और किराए की साइकिल सेवाएं भी उपलब्ध हैं।

यात्रा के लिए महत्वपूर्ण सुझाव 

  • यात्रा के लिए सर्दियों का मौसम (अक्टूबर से फरवरी) सबसे अच्छा है।
  • मंदिर प्रातः 6 बजे से संध्या 8 बजे तक खुला रहता है।
  • अपने साथ पानी की बोतल और कैमरा अवश्य रखें, क्योंकि यह स्थान बहुत ही दर्शनीय है।

कोणार्क सूर्य मंदिर अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यहां की यात्रा आपको एक अद्भुत अनुभव प्रदान करेगी।

बद्रीनाथ धाम का इतिहास, History of Badrinath dham temple

बद्रीनाथ धाम-

बद्रीनाथ मंदिर

    हिन्दुओं के चार धामों में से एक ब्रद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु का निवास स्थल है। यह भारत के उत्तरांचल राज्य में अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है। चार धाम भारत के चार धार्मिक स्‍थलों का एक सर्किट है। इस पवित्र परिधि के अंतर्गत भारत के चार दिशाओं के महत्‍वपूर्ण मंदिर आते हैं। ये मंदिरें हैं- पुरी, रामेश्वरम, द्वारका और बद्रीनाथ इन मंदिरों को 8वीं शदी में आदि शंकराचार्य ने एक सूत्र में पिरोया था। माना जाता है कि बद्रीनाथ सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और अधिक तीर्थयात्रियों द्वारा दर्शन करने वाला मंदिर है।

स्थापना-

बद्रीनाथ मंदिर1

   भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा चारों धाम में से एक के रूप में स्थापित किया गया था।
यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा है। बद्रीनाथ की यह मूर्ति शालग्राम शिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओंं ने नारदकुंड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की। मंदिर के दाहिने ओर कुबेर , लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है। इसे धरती का वैकुंठ भी कहा जाता है।

   शंकराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। मंदिर हिमपात की वजह से नवम्बर से लेकर अप्रैल के अंत  तक मंदिर दर्शनों के लिए बन्द रहता है।

श्री विशाल बद्री

   बद्रीनाथ धाम में श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है। श्री विशाल बद्री पंच बद्रियों में से मुख्य है। इसकी देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन मिलता है।

बद्रीनाथ धाम की कथा-

बद्रीनाथ मंदिर 2

   पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है इसलिए आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है इसलिए आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा।

   जहाँ भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग


भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग- 

   धार्मिक पुराणों के अनुसार भगवान शिव अपने भक्तों की तपस्या से प्रसन्न होकर जहां- जहां उनकी रक्षा और जन कल्याण के लिए प्रकट हुए उन स्थानों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में जाना जाता है। इनकी संख्या 12 है। आइए जानते हैं इन ज्योतिर्लिंगों के बारे में-

Bhagwan shiv ke  Jyotirling

1- सोमनाथ ज्योतिर्लिंग-


    सोमनाथ का यह मंदिर भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात के सौराष्ट्र की बेरावल बंदरगाह में स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर का असितत्व ईसा पूर्व से ही था । इस मंदिर का उल्लेख ऋगवेद में भी मिलता है।
सोमनाथ मंदिर के शिवलिंग की गिनती भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्बप्रथम के रूप में होती है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्मांण खुद चन्द्र देव यानि सोम देव ने करवाया था। इसी कारण इस मंदिर का नाम सोमनाथ पड़ा।
 कहते हैं इस स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया था । इस वजह से इस स्थान का महत्व और भी बढ़ गया ।

2- मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग-


    यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। इस पर्वत को दक्षिण भारत का कैलाश भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां आकर शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने वाले भक्तों की सभी सात्विक मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। भगवान शिव की भक्ति मनुष्य को मोक्ष के मार्ग पर ले जाने वाली है।
   धार्मिक शास्त्र 12 प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में शामिल इस ज्योतिर्लिंग के धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है

3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग-


    यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में स्थित है। यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में तीसरा माना जाता है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। यह ज्योतिर्लिंग तांत्रिक कार्यों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इस मंदिर के पास एक कुण्ड है जो कोटि कुण्ड के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस कुण्ड में कोटि तीर्थ स्थलों का जल है और इसमें स्नान करने से अनेक तीर्थ स्थलों में स्नान का पुन्य प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि इस कुण्ड की स्थापना राम भक्त हनुमान ने की थी।
    माना जाता है कि महाकाल की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। मान्यता है कि महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से भक्तों का मृत्यु और बिमारी का भय समाप्त हो जाता है। उन्हैं यहां आने पर अभय दान मिलता है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

4- ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग-


   ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले में स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों मे से एक है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से हुई है इसका उच्चारण सबसे पहले ब्रह्मा ने किया था। किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के उच्चारण के विना नहीं किया जाता। यह ज्योतिर्लिंग ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। यहां इस ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप हैं एक ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इन दोनों ज्योतिर्लिंगों की सत्ता और स्वरूप एक ही है।

5- केदारनाथ ज्योतिर्लिंग-


    केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। बाबा केदारनाथ का यह मंदिर समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।

  अगर वैज्ञानिकों की मानें तो केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा था, लेकिन फिर भी वह सुरक्षित बचा रहा। 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग आया था जिसमें यह मंदिर दब गया था।

  वैज्ञानिकों के मुताबिक केदारनाथ मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा फिर भी इस मंदिर को कुछ नहीं हुआ, इसलिए वैज्ञानिक इस बात से हैरान नहीं है कि ताजा जल प्रलय में यह मंदिर बच गया।

6- भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग-


   बारह ज्योतिर्लिंगों में भीमाशंकर का स्थान छठा है। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे के सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। कहते हैं जो भी व्यक्ति प्रतिदिन प्रात: काल इस ज्योतिर्लिंग के श्लोकों का पाठ करता है वह सात जन्मों तक के पापों से मुक्त हो जाता है।

   भीमशंकर मंदिर बहुत ही प्राचीन है। भीमशंकर मंदिर से पहले ही शिखर पर देवी पार्वती का एक मंदिर है। इसे कमला जी मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी ने राक्षस त्रिपुरासुर से युद्ध में भगवान शिव की सहायता की थी। युद्ध के बाद भगवान ब्रह्मा ने देवी पार्वती की कमलों से पूजा की थी।

7- काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग-


   विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण करेंगे। मंदिर के ऊपर के सोने के छत्र को ले कर यह मान्यता है कि अगर उसे देख कर कोई मुराद मांगी जाती है तो वह अवश्य ही पूरी होती है। यहां शिव लिंग काले पत्थर का बना हुआ है। इसके अलावा दक्षिण की तरफ़ तीन लिंग हैं, जिन्हें मिला कर नीलकंठेश्वर कहा जाता है।

8- त्रयंवकेश्वर ज्योतिर्लिंग-


    त्रयंवकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक जिले में गोदावरी नदी के करीव स्थित है। इसके सबसे नजदीक ब्रम्हागिरी पर्वत है और इसी पर्वत से गोदावरी नदी निकलती है। प्राचीनकाल में यह स्थान गौतम ऋषि की तपोभूमि थी। अपने ऊपर लगे गोहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए गौतम ऋषि ने कठोर तप कर भगवान शिव से मां गंगा को यहाँ अवतरित करने का वरदान मांगा था। फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम हुआ।  ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के तीन नेत्र हैं इसीलिए उन्हैं त्रयंवकेश्वर भी कहा जाता है। इसी कारण इस मंदिर का नाम त्रयंवकेश्वर पड़ा है। धार्मिक शास्त्रों में शिव पुराण में भी मंदिर त्रयंवकेश्वर मंदिर का वर्णन मिलता है। यहां से ब्रम्हागिरी पर्वत पर जाने के लिए सात सौ सीड़ियां हैं। सीड़ियोंसे ऊपर जाने के मध्य में रामकुण्ड और लक्ष्मण कुण्ड हैं। ऊपर पहुंचने पर गो-मुख जो गोदावरी नदी के उद्गम स्थान है के दर्शन होते हैं।

9- वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग-


   भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र वैद्यनाथ शिवलिंग झारखंड के देवघर में स्थित है। इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ धाम के नाम से भी जानते हैं। कहते हैं भोलेनाथ यहां आने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसलिए इस शिवलिंग को कामना लिंग भी कहते हैं। बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग में कावड़ चढ़ाने का बहुत महत्व है। भक्तजन सुल्तान गंज से गंगाजल लेकर 106 कि.मी. की पैदल यात्रा करके देवधर तक बैद्यनाथ धाम की यात्रा करते है।


10-नागेश्वर ज्योतिर्लिंग-


   यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग-

    रामेश्वरम का यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम भगवान श्री राम के नाम पर रामेश्वरम पड़ा।
  रामेश्वरम का यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले के मन्नार की खाड़ी में स्थित है। यह स्थान हिंदमहासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार का द्धीप है।
  बताया जाता है, कि बहुत पहले मन्नार द्वीप तक लोग पैदल चलकर भी जाते थे, लेकिन 1480 ई में एक चक्रवाती तूफान ने इस रास्ते को तोड़ दिया। जिस स्थान पर यह टापु मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ था, वहां इस समय ढाई मील चौड़ी एक खाड़ी है। शुरू में इस खाड़ी को नावों से पार किया जाता था। बाद में आज से लगभग चार सौ वर्ष पहले कृष्णप्पनायकन नाम के एक राजा ने उस स्थान पर पत्थर का बहुत बड़ा पुल बनवाया।
  अंग्रेजो के आने के बाद उस पुल की जगह पर एक जर्मन इंजीनियर की मदद से रेल का सुंदर पुल बनबाया गया। उस समय तक पुराना पत्थर का पुल लहरों की टक्करों से टूट चुका था। इस समय यही पुल रामेश्वरम् को शेष भारत से रेल सेवा द्वारा जोड़ता है।
 

12-घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग-

   घृष्णेश्वर महादेव का यह मंदिर एक प्राचीन प्रसिद्ध हिंदु मंदिर है। यह  मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद से 11 किलोमीटर दूर वेरुल गांव में स्थित है। इसे घृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक पुराणों विशेषकर रुद्रकोटि सहिता और शिव पुराण में इसका वर्णन मिलता है। लोग दूर-दूर से यहां दर्शनों के लिए आते हैं। यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम माना जाता है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं।
    

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास


घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग- 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

   घृष्णेश्वर महादेव का यह मंदिर एक प्राचीन प्रसिद्ध हिंदु मंदिर है। यह  मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद से 11 किलोमीटर दूर वेरुल गांव में स्थित है। इसे घृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक पुराणों विशेषकर रुद्रकोटि सहिता और शिव पुराण में इसका वर्णन मिलता है। लोग दूर-दूर से यहां दर्शनों के लिए आते हैं। यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम माना जाता है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं।

मान्यता-

    मान्यता है की घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग और शिवालय सरोवर का दर्शन करने से सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होते हैं। निसंतानों को संतान की प्राप्ति होती है। घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन व पूजन करने से सब प्रकार के सुखों की वृद्धि होती है। 

मंदिर का निर्माण- 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

    इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार महाराजा शिवाजी के दादा जी मालोजी भोंसले (वेरुल) ने 16वीं शताब्दी में कराया था। उसके पश्चात् इस मंदिर का पुनर्निर्माण 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी, अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था, जिन्हें काशी विश्वनाथ मंदिर, गया के विष्णु मंदिर और सोमनाथ के भव्य मंदिर जैसे अनेकों हिन्दू मंदिरों का जीर्णोद्धार कराने के लिए जाना जाता है। मुगल शासनकाल के दौरान कई बार इस मंदिर को ध्वस्त किया, और बार बार इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद अहिल्याबाई होल्कर द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया गया।

घृष्णेश्वर मंदिर की कथा-

   भारत के दक्षिण प्रदेश के देवगिरि पर्वत के निकट सुकर्मा नामक ब्राह्मण और उसकी पत्नी सुदेश निवास करते थे। दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त थे। परंतु इनके कोई संतान सन्तान नही थी, जिसके कारण वे बहुत दुखी रहते थे। इस कारण उनकी पत्नि उनसे दूसरी शादी करने का आग्रह करती रहती थी। अंतत: पत्नि के जोर देने पर सुकर्मा ने अपनी पत्नी की बहन घुश्मा के साथ विवाह कर लिया।

घृष्णेश्वर मंदिर

    घुश्मा भी शिव भगवान की अनन्य भक्त थी और भगवान शिव की कृपा से उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र प्राप्ति से घुश्मा का मान बढ़ गया। इस कारण सुदेश को उससे ईष्या होने लगी जब पुत्र बड़ा हो गया तो उसका विवाह कर दिया गया यह सब देखकर सुदेहा के मन मे और अधिक ईर्षा पैदा हो गई। जिसके कारण उसने पुत्र का अनिष्ट करने की ठान ली ओर एक दिन रात्रि में जब सब सो गए तब उसने घुश्मा के पुत्र को चाकू से मारकर उसके शरीर के टुकड़े कर दिए और उन टुकड़ों को सरोवर में डाल दिया जहां पर घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंग का विसर्जन किया करती थी।

   सुवह उठकर जब घुश्मा को इस बारे में पता चला तो घुश्मा जरा भी विचलित नहीं हुई और अपने नित्य पूजन व्रत में लगी रही। वह भगवान से अपने पुत्र को वापिस पाने की कामना करने लगी। वह प्रतिदिन की तरह शिव मंत्र ऊँ नम: शिवाय का उच्चारण करती हुई पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई। जब उसने पार्थिव लिंगों को तालाब में प्रवाहित किया तो उसका पुत्र सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा। अपने पुत्र को देखकर घुश्मा प्रसन्नता से भर गई। जब उसे पुत्र की मृत्यु के कारण का पता चला तो भी उसे अपनी बडी़ बहन पर क्रोध नही आया। घुश्मा की इसी सरलता, भक्ति और विशवास से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसको दर्शन दिए।

घृष्णेश्वर मंदिर1

   भगवान शिव घुश्मा की भक्ति से बहुत प्रसन्न थे उन्होंने घुश्मा को वरदान मांगने के लिए कहा, भगवाने ने कहा यदि वो चाहे तो वो उसकी बहन को दण्ड देगें। परंतु घुश्मा ने श्रद्धा पूर्वक महेश्वर को प्रणाम करके कहा कि सुदेहा बड़ी बहन है अत: आप उसकी रक्षा करे और उसे क्षमा करें। घुश्मा ने कहा हे 'महादेव' अगर आप मुझे वर देना चाहते हैं तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें। घुश्मा की प्रार्थना से प्रसन्न भगवान शिव जी ने उस स्थान पर सदैव वास करने का वरदान दिया। तथा उसी समय वह ज्योतर्लिंग के रूप में उस स्थान पर स्थापित हुए और घुश्मेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।